अंग्रेज़ गांधी को ‘आंदोलनजीवी’ बताकर मज़ाक उड़ाते, तो क्या हम आज़ाद होते

देश ने कई मुश्किल संघर्षों के रास्ते आजादी पाई, बहुमत पर आधारित लोकतंत्र को शासन प्रणाली बनाया और इसकी गारंटी के लिए बाकायदा एक संविधान अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया तो, इतिहास साक्षी है, कई देसी शक्तियों को उसकी यह कवायद कतई रास नहीं आई.

वे उसके संविधान और लोकतंत्र दोनों की खिल्ली उड़ाने पर उतर आईं. कभी वे कहतीं : मढ़ो दमामो जात नहिं, सौ चूहों के चाम यानी सौ चूहे मिलकर भी नगाड़ा मढ़ने भर को चमड़ा नहीं जुटा सकते और कभी यह कि शेर यानी शासक तो जंगल में अकेला ही होता है.

उनका आशय यह होता था कि देश में बहुमत के शासन की बेल का मढे़ चढ़ना बहुत मुश्किल है क्योंकि इसमें ज्यादा जोगी मठ उजाड़ और साझे की सुइयों के भी ‘सांगठ’ से चलने जैसी कहावतें सार्थक होती रही है.

गत सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद के प्रस्ताव पर राज्यसभा में हुई चर्चा का जवाब देते हुए राजधानी की सीमाओं पर किसानों के आंदोलन के सिलसिले में, जिसे वे और उनके समर्थक पहले दिन से ही अवमानित व लांछित करते आ रहे हैं, आंदोलनों की परंपरा और साफ-साफ कहें तो लोकतंत्र का ही मजाक उड़ाने लगे, तो ये पुरानी बातें सहज ही याद हो आईं.

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